ब्लाग्मंत्र : जिस तरह आंसू के लिए मिर्च जरूरी नहीं, वैसे ही बुद्धिमता सिद्ध करने के लिए ज्यादा से ज्यादा कमेंट्स व् उच्च्श्रलंखता जरूरी नहीं

Monday, October 8, 2012

ऍफ़० डी०आई० और राष्ट्रिय राजनीति का चरित्र

3 इडियट्स में आमिर खान : ये चटनी बड़ी निराली है, ये लोगो के चरित्र पता करने के काम आती है

2 यूपीए में मनमोहन सिंह : ये ऍफ़डीआई बड़ी निराली है, ये पार्टियों के चरित्र पता करने के काम आती है

जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार शैलेन्द्र श्रीवास्तव जी लिखतें है "आलोचना और विरोध की परवाह किए बगैर इस सरकार ने पेंशन में 26 फीसद एफडीआई को मंजूरी दे दी और बीमा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा
 को 26 फीसद से बढ़ाकर 49 फीसद कर दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में यह फैसला इससे पहले सरकार ने 14 सितंबर को मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत एफडीआई की मंजूरी दी थी। साथी ही नागरिक उड्डयन क्षेत्र में एफडीआई नियमों में और ढील देने का फैसला किया था। क्या गजब है कि कथित आर्थिक सुधारों पर दूसरे दौर के फैसले से पहले ही मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा,नामदल, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, बीजू जनता दल आदि ने बीमा और पेंशन में एफडीआई को मंजूरी का विरोध करने का ऐलान किया था। पर सरकार को किसी की परवाह नहीं। जाहिर है इस फैसले का विरोध तय है। विपक्षी दल इस फैसले की निंदा कर रहे हैं।"

सवाल ये है की क्या हर बार की तरह वे इस बार भी बस बाहर सरकार की निंदा करेंगे और संसद के अंदर सरकार का समर्थन ?

रियल एस्टेट के अनरियल रिश्ते


कांग्रेस पार्टी की सबसे ताकतवर नेता और अध्यक्ष सोनिया गांधी जी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा भारत के चंद  प्रतिभाशाली लोगो में है जो व्यसाय खासकर रियल एस्टेट की दुनिया में उभरता सितारा बनकर उभरें है. राजनेताओ के रिश्तीदारो ने राज पदों पर मुनाफ़ा कमाया हो यह कोई नयी बात नहीं पडोसी मुल्क में आसिफ अली ज़रदारी को बेनजीर के शासनकाल में मि० टेन परसेंट कहलाते थे, संजय गांधी ने जिस तरह मारुती में भूमिका निभाई कुछ कुछ वैसी ही व्यावसायिक भूमिका इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुहार्तो के पुत्र हुतोमो  ''टोम्मी '' मंडलापुत्र ने निभानी चाहि जिसके फलस्वरूप उन्हें राष्ट् से भगोड़ा तक घोषित होना पड़ा, खुद राजनीति में आने से पूर्व राहुल गांधी अपनी आई टी कंपनी चला चुके है .

हैंडीक्राफ्ट और कस्टम ज्वैलरी का सामान्य व्यवसाय करने वाले राबर्ट ने  धीरे धीरे रियल्टी सेक्टर में  एंट्री की जिसमे उनकी मदद  देश के सबसे बड़े प्रॉपर्टी डेवलपर डीएलएफ ने की, जिसने ना सिर्फ तथाकथित रूप से अडवांस या बिना गिरवी रखे कर्ज दिया साथ ही  कंपनी ने रॉबर्ट का अपना हिस्सेदार भी बनाया. बस इसी बात से लैस होकर गांधी जयंती से नेता बने अरविन्द केजरीवाल ने  प्रेस कांफ्रेंस कर जनता के सामने ये तथ्य रख कर  दावा किया कि वाड्रा की पांच कंपनियों ने बिना कोई कारोबार किए 50 लाख रुपये लगाकर 300 करोड़ की जायदाद अर्जित कर ली है जिसके प्रमाण के रूप में वे कंपनी शुरू करते वक़्त पूंजी जिसका विवरण वाड्रा ने कंपनी  पंजीयक के दस्तावेजो में की है. तीन साल में वाड्रा के  पास 300 करोड़ की संपत्ति आ गई, जिसकी मौजूदा बाजार कीमत 500 करोड़ बलाई जा रही है बस यही बात इस पूरे मामले को संदिग्ध बना देती है.  ओलम्पिक में मेडल  से लेकर अर्जुन टैंक बनाने तक में हम दशको का समय ले लेते  है तब ऐसी कौन सी विद्या से लैस होकर वाड्रा ने इतने जल्दी इतना ऐसेट बना लिया है और बना भी लिया है तो कैपिटल गेन टैक्स का क्या ? रखे रखे तो नाहे भाव बढ़ गए ये तो बेचें खरीदने की लगातार प्रक्रिया से बढ़ते है तब टैक्स तो बनता ही है.

बात को और साफ़ करें तो देखेंगी की बैलेंस शीट के मुताबिक़ डीएलएफ ने बिना किसी गारंटी या ब्याज के वाड्रा को 65 करोड़ रुपये दिए और फिर उसी रकम से उन्होंने डीएलएफ की ही जायदाद मार्किट मूल्य से काफी कम भाव में  खरीद ली जिसमे कंपनी ने गुड़गांव के मैग्नोलिया अपार्टमेंट में सात फ्लैट वाड्रा की कंपनियों को महज 5.2 करोड़ में दे दिए जिनका  बाजार भाव कम से कम 35 करोड़ था. एक अन्य सौदे में औरोलियाज अपार्टमेंट में एक पेंटहाउस सिर्फ 89 लाख में दे दिया, जिसकी कीमत बाज़ार में करीब  20 करोड़ थी, यहाँ तक की ना जाने कौन सी मजबूरी में इतने पैसे होने के बावजूद  कंपनी ने अपना दिल्ली के साकेत स्थित डीएलएफ हिल्टन गार्डेन होटल की 50 फीसद हिस्सेदारी सिर्फ 32 करोड़ में वाड्रा को बेंच दी जबकि उसका बाज़ार भाव 150 करोड़ था.इस बात को लेकर भाजपा प्रवक्ता ने भी चौका लगाते हुए पूछा 'कांग्रेस सरकारों ने डीएलएफ को सस्ते में जमीन दी और बदले में डीएलएफ ने वाड्रा को फायदा पहुंचाया। डीएलएफ वाड्रा के लिए इतना उदार क्यों थी? इसकी जांच होनी चाहिए'.

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते है जब मीडिया ने देश से सामने उजागर किया था की अपना जीवन नॉवल बेचने और वीसीपी किराये पर देकर चलाने वाला गोपाल कांडा जैसे ही गुडगाँव के  रीयल एस्टेट के  धंधे में आया रातो रात अरब पति बन गया था. उस वक़्त उसने गुड़गांव की सिकंदरपुर मार्बल मार्केट को कोर्ट के आदेश के बाद अलग जगह विस्थापन कर नए  प्लॉट आवंटन में काफी माल बनाया अब जाहिर है ये सब उसने बिना सरकारी सहयोग के तो किया नहीं होगा क्यूंकि जमीन सरकार की थी.

 आम आदमी के नाम पर अपना पर अपना अपना हिस्सा समेट कर नेताओं ने संसद चलने नही दी पर आम आदमी
एक अदद घर के लिए किस कदर से हैरान परेशान है उसका मुजाहिरा आवेदनों  की संख्या से लगती है,इस समस्या से निपटने के लिए सरकारें विवश है सो निजी
क्षेत्र  को आगे  बढाया जाना जरुरी था. अब हमारे यहाँ प्रक्रिया इतनी मजबूत
बनती  है की उससे कामकाज ठप्प सा हो जाता  है सो निजी क्षेत्र  भी मजबूर  हो जाती है और मजबूरी निचले पायदान के अफसरों के लिए आय का स्त्रोत बन जाती है.  निजी
क्षेत्र  में जो
कंपनिया मजबूर नहीं होती वे सरकार से ज़मीन मजबूर करके ले लेती है और इसी मजबू
री को पैदा करने के लिए रसूखदार और रियल एस्टेट कंपनिया मिल जाते है. 

इस माह  सरकार ने रियल एस्टेट को विदेशी निवेश के लिए खोल दिया है पर कानूनी ढांचा काफी लचर है  रीयल एस्टेट से जुड़ा बिल संसद में धुल खा रहा है . पहले नोयडा एक्स्टेंशन के किसान मुआवजे के विवाद में फंस जाने से हदासे हुए लोग अब वहा बेताहाशा मूल्य वृद्धि से तंग है, दबी छुपी जुबान में कुछ लोग कह रहे है बिल्डरों के द्वारा 'बक्षीश' देने की वजह से ये अप्रत्याशित महंगाई आयी है. लगभग सभी बिल्डर अपने नॉयैडा प्रॉजेक्ट्स मे एक तरफ़ा अग्रीमेंट बना रहा है. किसी भी बाइयर के पास कोई अधिकार नही है सिवाय उनकी शर्तो को मानने और साइन करने के. कोई भी बिल्डर नही बताता की सर्विस टॅक्स और स्टंप ड्यूटी किस किस चीज़ पर लगेगी और उनकी दर क्या होगी. बिल्डिंग प्लान, साएट प्लान, लोकेशन प्लान, मास्टर प्लान, फ्लोर प्लान, ले आउट प्लान मे क्या फ़र्क है इसकी जानकारी लिखित मे कोई नही दिखाता. पर्यावरण क्लियरेन्स, सेफ्टी क्लियरेन्स और बाकी जानकरी तो बिलकुर नही मिलती. टोटल क्लियरेन्स कितनी होती है और बिल्डर कितने क्लियरेन्स ले चुका है बाइयर को कुछ नही पता. सूपर एरिया तो सभी बताते है लेकिन लगभग कोई भी ऐक्चुयल कार्पेट एरिया नही बताता. बहुत गड़बड़ है सिस्टम मे पर अपनी टैक्स की दर को आसानी से बढाने वाली सरकार सुप्त है, इससे उसके खजाने को नुक्सान और चुने हुए 'सरकारों' को फायदा हो रहा है. इस सरकारी उदासीनता के मद्देनज़र जनता को बस न्यायालय , कॉम्पिटिशन कमिशन ऑफ इंडिया व् ग्राहक फोरम से ही आशाएं है.

बस विरासत है गाँव, जहा जाना एक पिकनिक है ?


शहरियों के लिए रुरल टूरिस्म बन गए है गाँव, जहा से निकले लोग गाँव कभी लौटे ही नहीं अगर लौटते भी है तो वो संस्कृति से जुड़ाव, शहरो में सामाजिक रूप से हाशिये पर होने के बाद अपनी सामंती जीवन शैली को याद करने के लिए , पर अफ़सोस गाँव भी अब वैसे नहीं रहे सामंती ठसक पुरी कराने के लिए मिलने वाले लोग अब मुंबई- दिल्ली, सूरत लुधियाना के कारखानों में अपना भविष्य टटोल रहे है. युवाओं से शुन्य होते गाँव भी अब किसी विवाह के बैंक्केट हाल के सामान हो गये है जहाँ लोगो का शादी ब्याह के वक़्त ही जमावाड़ा लगता है. जो वह है खुश नहीं है कृषि लागत बढ़ चुकी है, सड़के या तो पहुंची नहीं है या पहुँच कर भी क्रेटरमयी है,अगर किसी की तबियत बिगड़ जाए तो अस्पताल तक पहुंचना ओलंपिक मेडल की दौड़ के सामान हो जाता है . 6 से 7 घंटे बिजली में किसानी ढंग से होती नहीं तब बच्चे कैसे विकासपुरी, मयूर विहार, हौजखास या डिफेन्स कालोनी वालो की तरह पढाये जायेंगे, फिर अच्छे माध्यमिक विद्यालयों तक जाना अपने आप में जंग है. सोनू मोनू की तरह स्कूल वैन नहीं, 10 से 12 किलोमीटर सायकिल से जाना पड़ेगा दो लोग हो तो साथ में खींचो घर आकर गाय-गोरु रखाओ. माँ बाप की कमाई अच्छी है तो पढने के लिए पटना इलाहबाद तो पहुँच जायेंगे पर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए सहायता नहीं जुटा पायेंगे अंत में शहरो में मजदूरी मिल ही जायेगी. कुल मिलाकर ना पढ़ सकते है , ना खेती हो रही है, ना आमदनी ही है बस अगर कुछ है तो शाम को बैठकी, भिन्नई की गलचौरा और संस्कृति से जुड़ाव ऐसे में जब जमाने को होनोलूलू से लेकर हार्वर्ड जाते देखते है, सरकारी ओहदेदारों को किन्ही के आगे नतमस्तक देखते है तब व्यर्थ ही अपनी संस्कृति सहेजने की जिम्मेवारी पर कोफ़्त होता है, गाँव में घर और खेतीबारी की जिम्मेवारी पर कोफ़्त होता है

दिलीप मंडल जी ने इस पीड़ा पर तंज करते हुए लिखा है "भारत माता ग्रामवासिनी... जिस किसी ने भी लिखी है, वह पक्का शहरी आदमी होगा. उसे ही खेतों में फैला आंचल नजर आ सकता है. गांव को लेकर रोमांटिक होना खास शहरी शगल है. खुद शहर की सुविधाओं का इस्तेमाल करो और गांव के गीत गाओ. ऐसे लोग हवा बदलने के लिए या पिकनिक मनाने या अपनी सामंती ठसक का जलवा देखने कभी कभी गांव जाते हैं."

गांव की समरसता आज भी वहा की जान है वरना गाँव की झोंपड़िया कब की शहरी उपेक्षा की मिसाल झोपड़पट्टी बन जाती , फिर जातिगत श्रेष्ठता की संरंचना की पकड़ वहा भी काफी हद तक कमजोर हुई है जिससे वह सामाजिक न्याय की परंपरा और सुदृढ़ हो रही है. गांधी जी ने कहा था की गाँव में भारत की आत्मा बस्ती है सो गाँव  का आज भी विकल्प नहीं, हम कितने  शहरों की, कहाँ  कहाँ व्यवस्था करेंगे,उनमे भी  जिन्हें हम आज शहर कह रहे हैं, उनमे भी कई झोपड़ पट्टियाँ हैं जिनकी  दशा उन गावों से भी बदतर है.अंततः  गाँव ही हमें अन्न व् अर्थ को  और भविष्य की  विशाल आबादी को संभालेंगे इस लिए वक़्त आ गया है के सरकार अपने गाँव का ख़ास ध्यान दें

भारत की युवा ताक़त कहा है ?

जनसँख्या के आंकड़े के हिसाब से भारत में युवाओं की आबादी ज्यादा है .... जवान होते भारत में राज फिर भी बुजुर्गो का ही है, देश के नेतृत्व से लेकर सरकारी मशीनरी तक, बात सिनेमा के परदे की हो या क्रिकेट के मैदान की सब जगह बुजुर्ग स्टार ही छाए है. यूथ कांग्रेस में युवा की आयुसीमा 35 हैं, जबकि लोकसभा में औसत आयु 52 वर्ष है , यही बूढी माने जाने वाली औसत आयु भारत की क्रिकेट टीम का है , बाक्स ऑफिस पर छाए 10 बॉलीवूड कलाकारों का है.

पश्चिम यूरोप- अमरीका की आबादी के बराबर करीब 55 करोड़ युवा है भारत में जिसमे से आधे करीब 26 करोड़ टेलिकॉम क्रांति की वजह से मोबाईल रखते है अगर इतनी ही संख्या में टैबलेट मिल जाए तो सूचना क्रान्ति का भारत में दूसरा दौर शुरू हो जाएगा. ज्यादातर भारतीय युवाओं को स्किल -तकनीक में कमतर मानकर बेरोजगार रहना पड़ता है पर इस जैसी समस्या लिए भी युवा ही सामने आ रहे है. इसे देख कर तो लगता है वकत आ गया है युवा आगे आये और स्थान ले वर्ना यथास्तिथिवादी (जैसा है वैसा ठीक है मानने वाले ) इसी को बरक़रार रखेंगे, इस लिए राजनीति के सचिन पायलट -अरविन्द केजरीवालो, रुपहली दुनिया के शाहिद-रणबीरो और क्रिकेट की दुनिया के विराटो को अब हिम्मत दिखाकर आगे बढ़कर नेतृत्व लेना होगा.

(विचार प्रेरणा : आज अखबारों में आया बिग बॉस का विज्ञापन, बिग बॉस में पिछले वर्ष भी उम्र पर बहस चली थी. )

मैं अंग्रेजी हूँ, एक आम भाषा हूँ..



मैक्लायड की अनैतिक संतान से लेकर सूचना क्रान्ति की पटरानी तक सब रूप में अपने को देखा है,समाजवादी अरुचि से मंदिर बनवा कर मेरे पूजन तक सब झेला है .

विदेश से आई हूँ पर आपने समृद्ध नहीं किया क्या मुझे ?

सरकार की भाषा हूँ तो क्या इसलिए अभिजात्य हूँ ?

सवा सौ वर्षो से भारतवंशियो की सेवा कर रही अंग्रेजी के ये प्रश्न आसान नहीं इन्ही प्रश्नों पर उग्रनाथ जी का तथ्यपरक उ

त्तर " मैं इस प्रश्न में उलझा हूँ | क्या भाषा भी अभिजात बनाने में सहायक होती है | अंग्रेजी की आलोचना तो यही कहकर की जाती है | अपनी देसी भाषा हिंदी या अन्य कोई भी , के सापेक्ष यदि अंग्रेजी का प्रभाव देखें , तब तो यही कहना पड़ेगा | लेकिन अनुभव तो कुछ और भी इशारे करते हैं | भोजपुरी , अवधी , सामान्य भाषा बोलकर भी ज़मींदार बड़े आराम से सामंत बना होता था और बराबर शोषण और अत्याचार करता था , भले उसे अंग्रेजी बिलकुल न आती हो , या न बोलता हो | भाषा का उसके जलवे से कोई सम्बन्ध नहीं होता था | वह गालियाँ अंग्रेजी में तो नहीं देता रहा होगा ?"

पर्वो -तिथियों, स्मारकों, व् राष्टीय छुट्टियों में फंसी आस्थाएं





आम्बेडकरी आन्दोलन को ताबूत से निकाल कर सिंहासनतक पहुंचाने वाले बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम की पुण्यतिथि पर उत्तर प्रदेश सरकार ने एक फैसले के तहत सार्वजनिक अवकाश समाप्त कर दिया है. अपने संस्थापक की सार्वजनिक सफलता और बढ़ते कद के चलते बसपा सरकार ने पार्टी के संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि नौ अक्तूबर को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया था, हालांकि उस समय भी जानकार इसे एक गाँव गाँव में आंबेडकर की मूर्ति लगाने की तरह ही एक राजनितिक अजेंडा मान रहे थे.

एक समय में लोग नयी दिल्ली के प्रतिष्ठानों की बजाय नोयडा में ट्रांसफर करवाना चाहते थे कारण इस अत्याधिक पिछड़े हुए राज्य में हर बात पर प्रचुर छुट्टियों का होना था. ऐसे समय में राज्य सरकार का ये फैसला नीतिगत रूप से सही जान पड़ता है पर जमीनी हकीकत इससे इतर है. बसपा इसे दलित विरोधी मानसिकता का नाम देकर अपने वोट बैंक को अपने आदर्श के प्रति राजनितिक असम्मान की पुकार कर चुकी है, तो समाजवादी पार्टी बसपा से नाखुश लोगो को फुसला रही है. बसपा के प्रवक्ता ने यहाँ तक कह डाला की " उत्तर प्रदेश की सरकार अगर महापुरषों का सम्मान नहीं कर सकती तो वह उनके साथ खिलवाड़ भी न करे और बेजा हरकतों पर अंकुश लगाए", साथ ही पार्टी ने राजधानी लखनऊ में पहले ही तय कार्यक्रम कर एक विशाल रैली आयोजित की है.


राष्ट्रीय प्रतिष्ठानों में, राष्ट्रीय छुट्टियों में व् पर्वो में दलित-आदिवासी तत्व (मसलन बिरसा मुंडा, इ० व० रामासामी ' पेरियार ') की जबरदस्त नज़रंदाज़ी के बाद भी डॉ आंबेडकरको यथोचित सम्मान दिया गया है. इसी वंचित भाव के प्रतिकार स्वरुप खड़ा हुआ बहुजनवाद की एक धारा दलित -आदिवासी को एक नए वर्ग के रूप में मौजूदा समाज से तोड़कर देखती है. इसी प्रयास में नए नए मान्यताएं, आदर्श बनाये जा रहे है इतिहास का पुनर्पाठ भी उसी कवायद का हिस्सा है. ऐसे विचार पिछले 40 साल पहले पेरियार के समय से निरंतर आगे आते रहे है, ये पहचान राजनीतिक रूप से भागीदारी को भी सुदृढ़ कर चुकी है. आज उत्तर में बसपा, दक्षिण में द्रमुक और मध्य में कमलनाथ को चने चबवाने वाली गोंडवाना गणतंत्र पार्टी अपने सफल अभियान पर है यानी कुल मिलाकर नई पहचान राजनीतिक दलों के वोट बैंक को बनाने में भी सहायक हो रहे है. रीवर्स जातिवाद के आरोपों से हटकर भी देखें तो पायेंगे की सामाजिक न्याय समाज से कटकर तो नहीं मिलता. ऐसे में गढ़े हुए नए आदर्शो का सम्मान वृहद समाज के लिए मुश्किल होता है, इस समाज ने अपनी बनायी मान्याताओ के इतर भी कई बार चीजों को अपने में समाहित किया है. सनद रहे कुल परिवार के ज्ञात ना होने पर भी गौतम मुनि , कबीर को सर माथे बिठाया है, युवास्था में परिवार त्याग करने वाले सिद्धार्थ के मूल्यों को आदर्श बनाया है, मुंड हरने वाले अंगुलिमाल की कथा बच्चो को सुनायी है, रहीम-रसखान के लिखे को तुलसी-सूर की तरह पवित्र माना है. इन अनुभवों से लगत है जो सारे समाज के लिए महत्वपूर्ण होगा उसी स्वीकृति समाज खुद दे देगी उसे किसी राजकीय सहायता की आवश्यकता नहीं होगी , फिर उसकी राजकीय मान्यता के लिए व्यर्थ संघर्ष पथ पर जाना ही नहीं पडेगा.

अगर राष्ट्रीय स्तर पर सारी महान विभूतियों को जोड़ा जाये तो संख्या सौ से ज्यादा होगी पर आर्थिक भागीदारी राजनितिक भागीदारी के बाद अब सांस्कृतिक भागीदारी भी आत्मविश्वास के लिए जरुरी है, इस सांस्कृतिक भागीदारी के लिए क्या कीमत हो वो समाज खुद तय करेगा राजतन्त्र नहीं. आगरा में आंबेडकर जयन्ती किसी भी अन्य पर्व से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है तो ये समाज ने तय किया है राजसत्ता ने नहीं, आपके प्रश्न में ही उत्तर भी निहित है अगर भागीदारी के लिए आप जगह सुरक्षित कर सकते है तब राष्ट्रिय व् क्षेत्रीय आधार पर सांस्कृतिक तिथि पर्वो में भी उसी परिपाटी को निभाना होगा, संख्या महत्वपूर्ण नहीं .


गाँधी की राह पर दिल्ली के दीवाने ..



गांधी जी ने देश के तट पर बिखरे नमक को देश की जनता से जोड़कर सात समुन्दरो तक फैले ब्रिटिश हुकूमत की मनमानी को चुनौती दे दी, कद में केजरीवाल बेशक गांधी ना हो पर कालोनियों में बेतरतीब तारो के जाल में जबरदस्ती तार जोड़कर वे ऐसी ही कोशिश बिजली कंपनियों की मनमानी पर कर रहे है. अब देखना है की शिंदे जी की दिल्ली पुलिस कब तक बर्दाश्त करती है.

वैसे कपिल सिब्बल के खिलाफ किरण बेदी, संदीप दीक्षित के खिलाफ केजरीवाल , सज्जन के भाई रमेश कुमार के खिलाफ मनीष शिशोदिया अगले लोकसभा में भाजपा कांग्रेस को संयुक्त रूप से झटका दे सकते है और शीला के बाद भाजपा से विजय गोयल के मुख्यमंत्री बनने के सपने पर भी चोट कर सकते है इसी को भांप विजय गोयल तो केजरीवाल के साथ बिजली दफ्तर हाजरी लगा आये, कांग्रेस भाजपा के 'केजरीवाल' फैक्टर के डर को देख खुश है.

दिल्ली के अलावा काम करने से नुक्सान ही होगा क्यूंकि 'सब चोर है' की विचारधारा यही चल पायेगी . श्रमिक आन्दोलन, सामाजिक न्याय , परिवार व् सामन्ती परंपरा के अलावा अब नेता मीडिया से भी निकलते है, जिनका स्तर व् असर मीडिया की व्यापकता पर निर्भर होती है. मीडिया के बाबु जो हार्वर्ड या कर्नीज से पढ़कर आये है उनकी मुश्किल को भी समझिये, रुरल टूरिस्म तक तो ठीक है पर सरोकार की बात मत कीजिये जब नेता, इंजीनीयर डाक्टर, अध्यापक, प्रशासक ही नहीं जा रहे तो मेनस्ट्रीम के बड़े पत्रकार क्यों जाए भला, इसलिए नुक्कड़ में लंगर डाल कर बिजली लेना भी खबर है और जल में पैठे पाँव की पंद्रह दिन की गलन भी कम है. वैसे भी विज्ञापन टी वी और अखबार शहरीयो के लिए है गाँव की जरुरत ही क्या है.

भ्रष्टाचार की किसी भी लड़ाई, आवाज या राजनीतिक पहल की हार के प्रति हम कितने आश्वस्त है ये अरविन्द केजरीवाल के प्रयासों को फिसड्डी साबित करने के हमारे प्रयासों से पता चल गया.

सामाजिक संगठन से राजनीतिक संगठन की बात चली है तो इतिहास भी टटोला जाय बसपा के उद्भव के पीछें एक सामाजिक संगठन की कितनी बड़ी भूमिका है ये किसी से छुपा नहीं, जनसंघ भी संघ से निकला, भारत में भी विश्व भर की तरह या तो फेथ बेस्ड एन०जी०ओं० है या फिर साम्यवाद बेस्ड एन०जी० ओं० है, इन साम्यवादी एन०जी० ओं० के जनांदोलन और फिर बाद में उन्ही आन्दोलनों से राजनीतिक दखल भी किसी से छुपा नहीं. कोई भी संगठन आपसी विशवास व् सम विचारों से बढ़ते है, पैसे से पल्लवित होते है और राजनीति से सत्तानाशीन होते है.

आज कल की विकल्पहीन सियासी परिदृश्य में दो ही राह है, या तो अजित दादा को थाम लीजिये या फिर गडकरी को दोनों को नहीं थाम सकते तो साम्यवादी हो जाइए, जिसके अपने घाटे है इसमें बुद्धिजीवी मिल जायेंगे पर माध्यम वर्ग नहीं. अब माध्यम वर्ग ना होने की त्रासदी क्या होती है ये आजादी के वक्त पलायन से उन्हें खो चुके मुस्लिम समाज से पूछिए, इसलिए मुझे तो माध्यम वर्ग की इस कोशिश पर यकीन है. संदेह है तो बस संगठन के विस्तार पर है उसके लिए सरदार पटेल या दीनदयाल उपाध्याय कहा से लायेंगे केजरीवाल...